Tuesday, May 17, 2011

लव यू बेटा...





आज रिषित तीन साल का हो गया. किसी भी पिता के लिए ये बहुत ख़ुशी का क्षण होता है...हाँ ये अलग बात है कि नौकरी के चलते आज के खास दिन भी मैं उसके पास नहीं हु...
 मेरी खुशियों का और उसकी ख्वाहिशों का सिलसिला जारी है. जब उसका जन्म हुआ था तब तक शायद मेरे आधे से ज्यादा दोस्त ये भी न जानते थे कि मैं शादीशुदा हु...मुझे अजीब लगता था किसी को बताते हुए...किन्तु जब रिषित आया तो यह मेरी दुनिया का बहुत बड़ा परिवर्तन था..
रिषित के जन्मदिवस पर मैं उसकी मस्ती की बात करूँ...या उसकी अठखेलियों की...या चंचलता की..तो शायद आप कहेंगे ये तो हर बच्चे कि स्थिति है...शायद होगी...पर रिशु इस  मामले में कुछ ज्यादा ही अलग है...जैसे मैंने इस से पहले वाले पोस्ट में कहा था कि स्कूल जाते हुए वो आम बच्चो की तरह नहीं रोया...और जब रोया तो फिर उस से ज्यादा कोई आम था नहीं... 
जब मैंने किसी "भागवत कथा" में एंकरिंग के  लिए उपस्थित होता हु और चौथे दिवस जब प्रभु श्री कृष्ण का अवतरण होता है तो लगता है रिशु आ गया...पांचवे दिवस कृष्ण की बाल लीलाओं में और रिशु की मस्तियों में कोई खास फर्क महसूस नहीं होता...हाँ वहा पूरा गोकुल पागल होता है...यहाँ पूरा मोहल्ला.
कल शाम फ़ोन पर बात हुई...daddy मेरी नयी वाली कार मम्मा ने तोड़ दी...आप जब दिल्ली से आओ, तो मेरे लिए २ नयी कार, और एक जेसीबी लेते आना..( यहाँ बता दूँ कि जब कभी मैं उदयपुर से बाहर होता हु तो रिशु के लिए उसका तात्पर्य है...daddy जॉब पर है और दिल्ली में है...) किसी चेनल पर कार्टून में जेसीबी देख ली तभी से उसका दीवाना हो गया है...और हाँ कल जब मैं बड़ा सारा केक काटूँगा तो आप मुझे उठा लेना...नहीं तो केक ख़राब हो जायेगा...  daddy ! वन-टू ....... नहीं सेवन संता  केप भी लाना. वन वाली तो निशु भैया के लिए, टू वाली दुर्गेश चाचू  के लिए, थ्री इशी दीदी के लिए और वन मम्मा के लिए...आप केप में अच्छे नहीं लगते...इशलिये बाकी सब मेरी. .."
एक पिता को चाहे कुछ भी क्यों न करना पड़े, उसकी ये तमन्ना ज़रूर रहेगी कि उसके बेटे की कोई ख्वाहिश अधूरी न रह जाये... मेरी मम्मी अक्सर बताती है कि पापाजी बात किया करते थे...कि जो हमें न मिला, वो सब कुछ हमारे बेटे को ज़रूर मिलेगा.. उस समय (सन चौरासी) में मेरे ननिहाल में शायद मैं अकेला बच्चा था जो " जोह्न्संस एंड जोहंसंस " साबुन से नहाता था...पापाजी मेरे लिए वो साबुन अहेम्दाबाद से लाया करते थे... 
जब रिशु को पहली बार स्कूल छोड़कर आया तो मैंने कुछ ख़ास लोगो को ये एस.एम्.एस. किया " पता नहीं यार वो स्कूल में कितना रो रहा होगा, जब मैं उसे छोड़कर आया तो दरवाज़े की तरफ ही देख रहा था..." इस पर आर.जी. ने दिल्ली से रिप्लाय किया..."हाय रे बाप का दिल"... उदयपुर में मेरे अग्रज हेमंत जी चोपड़ा ने फ़ोन करके कहा..."ओमजी, इस एस.एम्.एस को हमेशा के लिए मैं अपने पास सहेजकर रखूँगा.जब रिशु का बच्चा स्कूल जायेगा तो यही एस.एम्.एस मैं उसे भेजूंगा कि एक बाप किस कदर इमोशनल हो सकता है.....
खैर फिलहाल रामनगर (नैनीताल) में हूँ. बापूजी की राम कथा चल रही है कल ही राम जन्म हुआ है...आज रामजी कि बाल लीलाओं का व्याख्यान होगा. बापूजी को पता है कि आज रिशु का जन्मदिवस है..शायद चलते लाइव में वे आस्था पर ही इसकी घोषणा करके तालियाँ न बजवा दे...पर शायद आज मेरा मन एंकरिंग में न लगे... मन उदयपुर में लगा हुआ है... आज कथा में राम न दिखेंगे... वहा रिशु को खोजने कि कोशिश करूँगा...
जब कोई पिता अपने बच्चे की बात करता है तो बहुत ज्यादा अनौपचारिक हो जाता है...मुझे पता है कि इस पोस्ट में बहुत कुछ गड्ड-मद्द हो गया है... कोई फर्क नहीं पड़ता...
आज अगर मैं उस से दूर हूँ तो उसी के सुखद भविष्य को लेकर.... क्योकि मुझे मेरे पापाजी कि ही उस बात को आगे बढ़ाना है...जो मुझे नहीं मिला...वो सब कुछ उसे मिलेगा.... वैसे मुझे मेरे बचपन में सभी कुछ मिला है....हहहहः
खुश रहो हमेशा... यु ही मुस्कुराते रहो...खिलखिलाते रहो...बाकि काम मैं कर लूँगा...
लव यू बेटा...
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"कैसे कैसे सवालात करता है
मेरा बच्चा मेरी तरह ही बात करता है...

कहता है, दम है तो उठाओ इसे पापा,
सामने अंगद की तरह पाँव करता है...

मम्मा अच्छी, पापा गंदे..
हमेशा भोली सी बात करता है...

जो है वो भी, जो नहीं है वो भी ला-दू..
छोटे छोटे आगे हाथ करता है...

सोते सोते हाथ से करता है इशारे...
नींद में वो रब से मुलाकात करता है..."

Monday, April 11, 2011

मेरे बेटे का स्कूल में पहला दिन..

आज मेरा बेटा ऋषित पहली बार स्कूल गया.पिछले कई दिनों से बहुत उत्साहित था. पिछले पांच सात दिनों से किसी ने ये सिखा दिया था... "अब तो स्कूल जाना पड़ेगा...टीचर की मार खानी पड़ेगी...टिफिन से लंच खाना पड़ेगा...डैडी की बाइक पर बैठ कर जाऊंगा..."  रोज़ सुबह शाम पोएम की तरह रटता फिरता रहा..
कल रात को सोते वक़्त भी मुझे बोलता है..." शुबे जल्दी उता देना, मेले को स्कूल जाना है..." और आज सुबह जल्दी उठ गया... मम्मी (उसकी दादी मेरी मम्मी) मुझे ब्रेकफास्ट दो ना...डैडी को उठाओ न... mumma (उसकी मम्मी) डैडी कहा गए... मुझे ब्रश करवा दो ना... लगभग एक घंटे तक उसका खेल चलता रहा... हमें बहुत हंसी आ रही थी... मम्मी ने उसके लिए पराठा टिफिन में पेक किया.. बेग में एक कॉपी रखी, पेंसिल.. वाटर बोतल में पानी भरा... पहला दिन था सो uniform की ज़रूरत तो थी नहीं.. सो उसको रेडी किया... करीने से बाल सवारें...कोई आम दिन होता तो वो अपने बाल फिर से बिखेर देता...उसे जमे हुए बाल रत्ती भर पसंद नहीं किन्तु.." टीचर की मार खानी पड़ेगी..." से मान गया.. बोतल गले में लटकाई और मेरी बाइक के पास आकर खड़ा हो गया...चलो में रेडी हो गया..."
घडी साढ़े सात बजा रही थी..स्कूल सवा आठ का था... घर से दूरी मुश्किल से 5 मिनिट...पर उसका उत्साह देखते ही बन रहा था... नीता उसे लेकर सामने मंदिर गयी..ठाकुर जी के धोक लगवाई... हनुमानजी के सामने हाथ जुडवाए... 
बैठ गया बाइक पर... मैं नहीं रोऊंगा..आप मत डरना... मैं भी नहीं डरता... मैं टिफिन खा लूँगा...पानी भी पि लूँगा...उसका मुह कुछ ना कुछ बोलता ही जा रहा था.....चुप रहने का तो सवाल ही नहीं...असर पूरा है...वर्ना उसका बाप क्या कम चुप रहता है ???
स्कूल में क्लास में बिठाया..बच्चे आते जा रहे थे.. कुछ रोना शुरू..पर ऋषित को फर्क नहीं पड़ रहा था..हां बस चेहरे से मुस्कान गायब होते देर नहीं लगी...बिलकुल चुप...अब तो आवाज़ भी गायब...बस रोया नहीं...ये बात मुझे ख़ुशी दे रही थी..अन्दर से मैं बहुत भावुक हो रहा था पर बाहर हंस रहा था.. 10 -15 मिनिट तो मैं उसके पास बैठा रहा...बच्चो से उसे हाथ मिलवाता रहा..एक दुसरे से परिचय करवाता रहा...पड़ोस में एक बच्ची रोने लगी तो ऋषित उसे देखकर थोरा सा उदास हुआ.... टीचर का पदार्पण हुआ......सभी परेंट्स से रिक्वेस्ट है कि बाहर चलें जाये, आप टेंशन न लें..यहाँ आपके बेबी कि ठीक से देखभाल होगी. .... जैसे ही मैं उसके पास से उठा ऋषित भी उठ गया...बोतल गले में डाली ..बेग उठाया और बोलता है चलो...स्कूल ख़तम हो गया...मैं बहुत भावुक हो रहा था... मैंने कहा शाम को बड़ी वाली आइस-क्रीम खिलाऊंगा..नहीं चाहिए...जूस पिने चलेंगे...नहीं....फ्रूटी पिएगा या अप्पी-फ़िज़...कुछ नहीं पीना....मुझे mumma के पास ले चलो...स्कुल ख़तम हो गया..मुझे घर जाना है...
मैं बाहर आ गया...मुझे बाहर जाता देखकर वो जोर जोर से रोना शुरू.....मन ही मन सोचा..अगर पलटा तो फिर उसे चुप करवाना भारी हो जायेगा...  टीचर बोलती है आप टेंशन ना ले..थोरी देर में चुप हो जायेगा...बाहर माइक पर बार बार एनाउंस हो रहा था...सभी परेंट्स से रिक्वेस्ट है बाहर आ जाये..यहाँ बच्चो कि अच्छे से ख्याल रखी जाएगी...
मैं बाइक तक आया.. मन नहीं माना..वापस अन्दर गया... दूर से देखा...सभी बच्चे अपनी अपनी सीट पर बैठे बैठे रो रहे थे...पर ऋषित अपनी सीट पर नहीं दिखाई दिया...मुझे टेंशन हुआ...तभी देखता हु...टीचर ने हाथ पकड़ कर रखा है...और वो बाहर की तरफ देखता हुआ जोर जोर से रो रहा है...
तभी एक टीचर पास में आया, और मुझे बोला...आप बाहर चले २-3 दिन में सब रोना धोना बंद...होता है यार...आप क्यों उदास होते हो...
हाँ यार..मैं क्यों उदास हो रहा था...मेरी आँखों में पानी था..एकदम से ध्यान गया...अरे ये कब आ गया... वो पहली बार किसी और के हाथो में था...मेरे परिवार के सबसे छोटे  सदस्य ने  अपनी ज़िन्दगी की राह खोजने की दिशा में पहला कदम बढाया... पूरे तीन घंटे वो अपने परिवार से दूर रहने वाला है... 
मैं अपने आंसू रोकने कि कोशिश करता हु..... सुलानिया (मेरा जयपुर वासी मित्र) का फ़ोन आता  है... बोलता है, अभी ऋषित रो रहा है...थोड़े दिन रुक,फिर प्रिंसिपल रोयेगा..."
मैं चुप हो जाता हु...

Tuesday, April 05, 2011

अन्ना हजारे..आज़ादी की दूसरी लड़ाई में हम आपके साथ है...

बेईमान अन्ना !
तुम क्यों नहीं
क्रिकेट देखते
कोला बेचते अन्ना
तुमको भी दे देते कोई
अवार्ड अन्ना
देश की तुमको क्या पड़ी
देखो ना
अपना वार्ड अन्ना
कितनी दुकाने सजी हुई थी
संसद के चकले पर
क्यों उघाड़ते हो
उनकी पहचान अन्ना
गांधी की मजार पर रोते हो
नमक तो कब से बिक रहा
इस देश में
सरेआम अन्ना
किसको पकड़ेगा कौन पकड़ेगा
यहाँ सभी मिलकर गाते
भ्रष्टाचार का राष्ट्रगान अन्ना
और हम भी तो जुटते है तभी
जब तमाशा हो क्रिकेट या फिल्म
या पीने का हो सामान अन्ना
देश तो कब का आगे बढ़ गया
छोड़कर पीछे
असली पहचान अन्ना
तू भी बन जा ना
हम जैसा अनजान
बेईमान अन्ना !

कितनी अजीब बात है की हम सभी भारत वासी क्रिकेट क मामले में एक होने में देर नहीं लगाते ...किन्तु देश के भले का काम हो तो..हमारी नानी मर जाती है...
वो ...एक 80 साल का बूढ़ा वो करके दिखा रहा है, जो हम नहीं कर सकते...गाँधी जी के बताये रस्ते से वो आज भी इस जिद पर अड़ा है कि बदलाव ज़रूर होगा....क्या हमें उसका साथ नहीं देना चाहिए...???सुना है , जिस रात भारत विश्वकप जीता, पूरी रात दिल्ली के लोग इंडिया गेट के वहा जुटे रहे...यहाँ देश के लिए कुछ करना है...विचार मत कीजिये...मैं जा रहा हु..जंतर मंतर...आप अपने अपने शहर में शुरू हो जाइये...क्योकि मामला किसी पार्टी का नहीं... देश का है...मेरे हिन्दुस्तान का है..

आपसे उम्र में बहुत छोटा हु...बस इतनी विनती है कि उस बूढ़े इंसान का इतना support करो कि आने वाली जेनरेशन अब इस आन्दोलन को याद रखे...ये सिर्फ लोकपाल की लड़ाई न बने...अब आर पार की लड़ाई का वक़्त है...मेरी request है... जब छोटे छोटे देशो में लोग बदलाव के लिए सड़कों पर उतार सकते है तो...ये देश तो प्रताप, शिवा, झाँसी कि रानी और गाँधी-भगत का देश है...
i request, please अब देर न करो...कोई पार्टी अपना बैनर दे, तो मत लेना... क्योकि हिंदी की पुरानी कहावत है... चोर चोर मौसेरे भाई... ये आम हिन्दुस्तानी कि लड़ाई है... इन भ्रष्ट नेताओं को दूर भगाकर हमें सच्ची आज़ादी लानी है... ये आज़ादी की लड़ाई है...
विवेकानंद की पंक्ति अब हमारा लक्ष्य होना चाहिए..."उठो, जागो और अपने लक्ष्य तक पहुचने से पहले मत रुको....."फैसला आपके हाथ...
**यह आलेख दैनिक भास्कर समाचार पत्र में  प्रकाशित हो चुका है.**

Monday, April 04, 2011

ये नया भारत है.... इसे अपने बाजुओं पर भरोसा है...

दुनिया की दो सर्वश्रेष्ठ टीमें.. . दोनों ने एक एक बार विश्व कप को चूमा है. दोनों को जितना था अपने अपने महानतम खिलाडियों के लिए. भारत को सचिन के लिए, लंका को मुरली के लिए. दोनों कप्तान विकेटकीपर. पर किस्मत मेच के पहले ही संगकारा के साथ हो ली. धोनी का जीता हुआ टॉस बेजा गया. और दुबारा टॉस होने पर संगकारा की झोली में गिरा. दर्शकों ने इस अपशकुन को भुलाया नहीं था कि देखते ही देखते लंका ने 275 रन का पहाड़ खड़ा कर दिया...
उस पर मुसीबत का पहाड़ ये कि सहवाग और सचिन...जिनसे बेहतर उम्मीद थी...देखते ही देखते पेवेलियन चले गए...कहावत है कि वेल बिगन ईज  हाफ  डन..यानि अच्छी शुरुआत ही आधी जीत होती है..इस हिसाब से हम आधा हार चुके थे. 31 रन और दो शेर ढेर... अब जिम्मेदारी युवाओं के कंधो पर थी...
साँसे बार बार रूकती रही...कलेजा मुह तक आता रहा...गंभीर और धोनी ने ने मिलकर 121 करोड़ दिलों की धडकनों को धीरे धीरे सामान्य करने की कोशिश की. गंभीर सहज रहे और अगले २० ओवर तक  थमे रहे. संगकारा ने किले बनाये, चक्रव्यूह रचे...अपने बेहतरीन आक्रमण का इस्तेमाल किया..गंभीर 97  रन  बनाकर लौट गए...युवी आये...आखिर में चार रन बनाने थे कि....धोनी ने छक्के से विजय गाथा लिख दी...
किस्मत के छक्के छूट गए. वर्ना विरोधी टीम को आखिरी दस ओवर में चोक करने में लंका का कोई मुकाबला नहीं.उसके पास मलिंगा जैसी रफ़्तार है. मुरली जैसा छल. क्या नहीं था संगकारा के पास और क्या था धोनी के पास...?? सच ये है की धोनी के पास लक्ष्य था...स्पष्ट. और उस लक्ष्य के खातिर बहाने को बहुत सारा पसीना. पसीने का कोई पर्याय नहीं...किस्मत का है.
121 करोड़ आत्माओं में गूंजती प्रार्थनाएं,और होठों पर बुदबुदाते दरूद शरीफ अगर ग्यारह लोगो में प्रवेश कर जाये तो शायद ही उसका कोई पर्याय हो...
सचिन दस साल के थे जब भारत ने विश्व कप जीता था. छ विश्व कप उन्होंने खुद खेले पर किस्मत हर बार उन्हें छलती रही. ये उनका संभावित आखिरी मेच था..सो टीम ने किस्मत को छलकर उन्हें ज़िन्दगी की सबसे बड़ी ख़ुशी दे दी....
**यह आलेख दैनिक भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित हो चुका है.**

Sunday, February 06, 2011

गब्बर सिंह का जीवन चरित्र..




1.सादा जीवन,उच्च विचार: उसके जीने का ढंग बड़ा सरल था.पुराने और मैले कपड़े,बढ़ी हुई दाढ़ी,महीनों से जंग खाते दांत और पहाड़ोंपर खानाबदोश जीवन.जैसे मध्यकालीन भारत का फकीर हो.जीवन में अपने लक्ष्य की ओर इतनासमर्पित कि ऐशो-आराम और विलासिता के लिए एक पल कीभी फुर्सत नहीं.और विचारों में उत्कृष्टता के क्या कहने! 'जो डर गया,सो मर गया'जैसे संवादों से उसने जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला था.

२.दयालु प्रवृत्ति: ठाकुर ने उसे अपने हाथों से पकड़ा था.इसलिए उसने ठाकुर के सिर्फ हाथोंको सज़ा दी.अगर वो चाहता तो गर्दन भी काट सकता था.पर उसके ममतापूर्ण और करुणामयह्रदय ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.
3.नृत्य-संगीत का शौकीन: 'महबूबाओये महबूबा'गीत के समय उसके कलाकार ह्रदय का परिचय मिलता है.अन्य डाकुओं की तरह उसका ह्रदयशुष्क नहीं था.वह जीवन में नृत्य-संगीत एवंकला के महत्त्व को समझताथा.बसन्ती को पकड़ने के बाद उसके मन का नृत्यप्रेमी फिर से जागउठा था.उसने बसन्ती के अन्दर छुपी नर्तकी को एकपल में पहचान लिया था.गौरतलब यह कि कला के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने कावह कोई अवसर नहीं छोड़ता था.

4.अनुशासनप्रिय नायक: जब कालिया और उसके दोस्त अपने प्रोजेक्टसे नाकाम होकर लौटे तो उसने कतई ढीलाई नहीं बरती.अनुशासन के प्रति अपने अगाधसमर्पण को दर्शाते हुए उसने उन्हें तुरंत सज़ा दी.

5.हास्य-रस का प्रेमी: उसमें गज़ब का सेन्स ऑफ ह्यूमर था.कालिया और उसके दो दोस्तों कोमारने से पहले उसने उन तीनों को खूब हंसाया था.ताकि वो हंसते-हंसते दुनिया को अलविदा कह सकें.वह आधुनिक यु का'लाफिंग बुद्धा'था.
6.नारी के प्रति सम्मान: बसन्ती जैसी सुन्दर नारी का अपहरणकरने के बाद उसने उससे एक नृत्य का निवेदन किया.आज-कलका खलनायक होता तो शायद कुछ और करता.

7.भिक्षुक जीवन: उसने हिन्दू धर्म और महात्मा बुद्ध द्वारादिखाए गए भिक्षुक जीवन के रास्ते को अपनाया था.रामपुर और अन्य गाँवों से उसे जोभी सूखा-कच्चा अनाज मिलता था,वो उसी से अपनी गुजर-बसर करता था.सोना,चांदी,बिरयानी या चिकन मलाई टिक्का की उसने कभी इच्छा ज़ाहिर नहींकी.


8.सामाजिक कार्य: डकैती के पेशे के अलावा वो छोटे बच्चों कोसुलाने का भी काम करता था.सैकड़ों माताएं उसका नाम लेती थीं ताकि बच्चे बिना कलह किए सोजाएं.सरकार ने उसपर50,000रुपयों का इनाम घोषित कर रखा था.उस युग में'कौन बनेगा करोड़पति'ना होने के बावजूद लोगों को रातों-रातअमीर बनाने का गब्बर का यह सच्चा प्रयास था.


9.महानायकों का निर्माता: अगर गब्बर नहीं होता तो जय और व??रू जैसे लुच्चे-लफंगे छोटी-मोटी चोरियां करते हुए स्वर्ग सिधार जाते.पर यह गब्बर के व्यक्तित्व काप्रताप था कि उन लफंगों में भी महानायक बनने की क्षमता जागी.
( मेरे एक मित्र को धन्यवाद् कहिये, जिन्होंने इस विषय पर पी.एच.डी. की है....)

Monday, January 03, 2011

Tuesday, December 21, 2010

प्रेम में डूब....

प्यारे मित्र,

तेरा पत्र मिला है.
अच्छा लगा...
मैं कहूँगा,
प्रेम में डूब.
क्योंकि, उसी सागर में डूबने से वह मिलता है,
जिसकी तलाश है.
प्रेम ही एकमात्र धन है.
इस सूत्र की मन में गाँठ बांध ले..
प्रेम नहीं पाया तो कुछ नहीं पाया.
प्रेम गंवाया तो सब कुछ गँवा दिया.
और, प्रेम पा लिया, तो सब पा लिया.
और, तू पा सकती है.

क्योंकि मैं तो तेरी उन गहराईयों को भी जानता हूँ ,
जिन्हें तू नहीं जानती है.
मैं तुझे पहचानता हूँ .

वहां सबको मेरा प्रणाम..

Sunday, December 19, 2010

बापू !!! बड़ी कम्बल लेकर आओ

आज़ादी के इतने साल बाद
पता नहीं क्या सूझी थी बापू को भी
स्वर्ग से उतर आये दिल्ली की सड़कों पर
हाथ  में लिए कम्बल 
और दिल में ये भावनाएं छुपाये
कि शायद ये कम्बल किसी के काम आ जाये...!!
लगता है अभी आदत गयी नहीं थी उनकी परोपकार की...

सड़क पर चलते हुए 
किनारे बैठे एक वृद्ध के कंधे पर
रखकर अपना दयालु हाथ
बोले बापू विनय के साथ !!
"भाई रख लो ये कम्बल...तुम्हारे काम आएगी
दिल्ली की भीषण सर्दी से बचाएगी...!!''

उस वृद्ध ने चुटकी ली,
"मुझे मालुम था बापू !!
तुम ज़रूर आओगे
अपने सपनो के भारत को देख जाओगे...
लेकिन ये क्या, लाये तो भी क्या लाये ??
एक कम्बल तोहफे में !!

मेरा क्या है बापू, जैसे तैसे चला लूँगा
कम्बल न हो तो प्रदुषण से ही काम चला लूँगा !!!

जाओ इस कम्बल को हमारे नेताओं को दे आओ
इस से पहले कि देश की अस्मिता दम तोड़ दे,
सैकड़ो घोटालों को लपेटकर इस काली कम्बल में,
देस की अस्मिता बचाओ...

या इसे मुंबई ले जाओ
हमारी राखी मल्लिका को दे आओ
इस से पहले कि देश कि आबरू दम तोड़ दे
इण नंगियों को लपेटकर इस कम्बल में
देश कि आबरू बचाओ..!!

अगर इस कम्बल ने सोखने की क्षमता पाई है
तो इसे "नक्सल" में ले जाओ, 
वहां आतंक की बन्दूक ने खून की नदी बहाई है

अगर इस कम्बल को और अधिक लोगों में बाँटना चाहो
तो इसे गरीब लोगों के कफ़न के रूप में आजमाओ
पर मुझे मालूम है बापू
ये कम्बल लाखों लोगों के दर्द को नहीं झेल पायेगी
और आंसुओं की बाढ़ में बह जाएगी..!!

चुप क्यों हो बापू ??
कुछ तो बोलो
मुझे डांटन फटकारो
या फिर  स्वर्ग में जाओ और ....
एक बड़ी कम्बल लेकर आओ
एक बड़ी कम्बल लेकर आओ.....!!!!"

(रचना कई बार मेरे द्वारा मंच पर सुनाई गयी है.)

Monday, March 15, 2010

परमार्थ......

क्या हमें अपने आप से प्यार नहीं है ?  है- यही उत्तर है. हमने शायद खुद से कभी नफरत नहीं की. यही हाल पूरी दुनिया के लोगो का है. सभी को अपने आप से बहुत प्यार है. इस बात से साबित होता है कि मानव के मन में प्यार है. फिर ये प्यार परस्पर एक दुसरे पर न्योछावर क्यों नहीं होता ?  प्यार में कैसी कंजूसी ?  प्यार में कैसी तुलना ?  प्यार में कैसा असंतुलन ?  इसका प्यार उजला... उसका प्यार काला ... यह कैसा विरोधाभास है प्यार में ??
कहीं ऐसा तो नहीं है कि जिसे हम प्यार समझ रहे हैं, वह हमारा स्वार्थ है ?  स्वार्थ में होता है विभाजन का अवगुण. स्वार्थ प्यार की महानता  को शुद्रता में बदलने का अवगुण रखता है. फिर- अगर स्वार्थ में आर्थिक उंच-नीच है तो प्यार का मानव से रत्ती भर भी सम्बन्ध नहीं रहेगा. हाँ- प्रेम ही एक ऐसा धागा है जो स्वार्थ भी कहने लगे- हाँ- मैंने स्वार्थ किया- इश्वर को पाने का स्वार्थ. ऐसे स्वार्थ को पकड़कर  मैं भूल ही गया कि प्यार क्या होता है. मेरा स्वार्थ ही मेरा प्यार बन गया. मुझे मेक्सिको  की एक लोक कथा याद आ रही है. कथा पढ़कर बताना कि यह किस प्रकार का स्वार्थ है ??

एक किसान था. उसकी फसल ओले पड़ने से नष्ट हो गयी. उसकी मदद करने वाला कोई नहीं था. सभी किसानो की थोड़ी कम ज्यादा फसल नष्ट हुई थी. उस किसान को भगवान्  में पूरा भरोसा था. उसने लोगों से सुना था कि भगवान् गरीबों की मदद .  अवश्य करते हैं. किसान ने भगवान् के नाम चिठ्ठी लिखी, चिट्ठी पर स्वर्ग का पता लिखा. और चिट्ठी लेटर  बॉक्स में डाल दी. स्वर्ग के पते वाली चिट्ठी देखकर पोस्ट मास्टर ने चिट्ठी पढ़ ली. लिखा था-
हे दयालु भगवान ! मैरी फसल आपके बरसाए ओलो से नष्ट हो गयी. अतः आपसे प्रार्थना है कि मुझे फसल नष्ट होने का 100 रूपया भुगतान करें. आशा है आप अवश्य मुझ पर कृपा करेंगे. आपका गरीब किसान.
पोस्ट मास्टर को किसान कि चिट्ठी पढ़कर दया आ गयी. उसने इधर उधर से चंदा किया.चंदे में अस्सी रुपये इकठा हुए.पोस्ट मास्टर ने वो  अस्सी रुपये एक लिफाफे में भरकर किसान को भिजवा दिए. किसान ने भगवान् से सौ रुपये मांगे थे, मिले अस्सी ही ...
तब किसान ने हाथ जोड़कर भगवान् से  विनती की- हे भगवान् ! आपने रुपये भेजे...आपका बहुत बहुत धन्यवाद. लेकिन भविष्य में रुपये लिफाफे में भरकर मत भेजना- मनी ऑर्डर  से भेजना. क्योकि ये डाक घर वाले बहुत चोर होते है.तेरे भेजे सौ रुपयों में से इन्होने बीस रुपये चुरा लिए- धन्यवाद.

इस कथा में स्वार्थ भी है. विश्वास भी है.आस्था भी है. दया भी है और सजगता भी है. परन्तु एक अदृश्य प्रेम भी है. मानवता के लिए प्रेम. पोस्ट मास्टर ने गरीब किसान की कारुणिक स्थिति को देखा....प्रभु  के प्रति उसकी भक्ति को देखा...उसने लोगो से सहयता मांगी...लोगों ने भी सहायता की. यहाँ किसी का स्वार्थ नहीं था. बस एक स्वार्थ ज़रूर था...परमार्थ का स्वार्थ.जब हम किसी दीन- दुखी की सेवा करने आगे बढें तो भगवान् हमारा "स्वार्थ" ज़रूर पूरा करता है...
यही मेरा विश्वास है. हे इश्वर ! ऐसा स्वार्थ प्रदान कर जो परमार्थ की प्रेरणा देता है......
ॐ इती श्री ही....

Wednesday, March 03, 2010

आवागमन....

कितने युग बीते आकाश को....
कितने युग बीते धरती को...
कितने युग बीते सूरज को...
कितने युग बीते चन्द्रमा को...
कितने युग बीते मनुष्य को...
कितने युगों से बह रही है नदियाँ...
कितने युगों से हो रही है वर्षा...
कितने युगों से लग रही है भूख...
कितने युगों से लग रही है प्यास....
सर्दी-गर्मी बदली ऋतुएं..
भूकंप-सुनामी-आंधियां-तूफ़ान...
कितने युगों से चल रहा है काल-चक्र
कितने युगों से बह रहा है समय दयान्वान...
कितने युगों इ चल रहा है समय निर्मम...
ये कविता नहीं है...
यह सत्य है
यह हो रहा है युगों से...निरंतर हो रहा है...
जन्म ले रही है मृत्यु
मृत्यु में जी रहा है जीवन...
कहीं मोक्ष में कामना जी रही है...
कहीं विनाश की बिजलियाँ चमक रही है....
चेतावनियाँ देते रहते है आते-जाते मौसम...
सूर्योदय से सूर्यास्त तक घटित हो रहा नित नूतन...
कुछ भी रुका हुआ नहीं...चल रहा सभी कुछ....
हो रहा सब कुछ....
किस सोच में पड़ गए मित्र ?
क्या कष्ट है ?
क्यों हो इतने परेशां ?
ये घुटन कैसी ?
संतोष नहीं है ना ?
क्यों नहीं है ?
सोचो 
उत्तर सोचो
यह आते जाते क्षण भंगुर पल
सब कुछ गमन-आगमन में लगा हुआ
तो इस तरह बैठना उचित है क्या ?
किस आशा में बैठे हो?
किसी चमत्कार की आशा में ?
चमत्कार नहीं हुआ तो ??
फिर उठो
कर्म करो
कर्म को धर्म मान कर उठो
मानव सेवा करो
नारायण सेवा करो
हजारो है दुखी पीड़ित मनुष्य
इन्हें अपना लो
कहीं ऐसा न हो
की जो भूखा हो-वही नारायण हो
तेरी परीक्षा लेने आया हो...
क्या इस परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं होना है ??
लो अभी निर्णय...करो प्रतिज्ञा कर्म की...
कर्म की.....मानव धर्मं की....

Friday, January 22, 2010

हद की भी हद हो गयी......

मेरा उदयपुर अपनी खूबसूरती.... अपनी मेहमान नवाजी के लिए पूरे  विश्व में जाना जाता है....पर पिछले कुछ समय से जैसे मेरे शहर की अस्मिता को ही कोई ग्रहण लग गया लगता है.... कोई तीन साल पहले उदयपुर की मुख्य झील फ़तेहसागर  में तीन कन्या भ्रूण  मिले थे... तो अब एक डॉक्टर की लापरवाही से एक नवजात की साँसे "कट" गयी....और उसके बाद वो डॉक्टर..जो खुद उस जनाना अस्पताल की अधीक्षक भी है...खुद एक माँ भी है....कहती है....ऐसी घटनाएं तो होती रहती है...
उदयपुर के सरकारी पन्नाधाय जनाना अस्पताल में एक सिजेरियन के दौरान डॉक्टर की लापरवाही से ब्लेड से नवजात का एक हाथ  कट गया.हाथ काटने के तीसरे दिन नवजात की मौत हो गयी. अस्पताल की अधीक्षक डॉक्टर  कमलेश पंजाबी की यूनिट में हुई इस लापरवाही के बाद उनका गैर जिम्मेदाराना कमेन्ट यहाँ चर्चा का विषय बना हुआ है. कलेक्टर आनंद कुमार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल जांच के आदेश दे दिए है.इस लापरवाही पर वरिष्ठ डॉक्टरों से कोई जवाब देते नहीं बन रहा है...डॉक्टरों की साँसे फूली हुई है..सभी बड़े डॉक्टर्स  ने अपने मोबाईल फोन बंद कर दिए है..."

ये एक शर्मनाक लापरवाही है.....

हद की भी हद हो गयी. बबली (मां)   के जिगर के टुकड़े हो गए और डॉक्टर ने अपने हाथ "दास्ताने" में छुपाने के लिए जी-जान लगा दी. संवेदनाओं की बलि होने की वेदना को हर इंसान ने झेला और....शिशु हाथ ही नहीं जान से भी चला ग्गाया. आखिर कहाँ गिरेंगे ये आंसू मिस्कीनी के...इधर खून जिगर का...उधर सितमगर.." एक डॉक्टर की बेशर्मी की वजह से बबली माँ बनकर भी मातृत्व का सुख नहीं पा सकी, एक ज़िंदा लाश बन गयी है .
एक माँ की कोख उजड़ने की कगार पर थी,मगर महिला डॉक्टर अपनी टीम पर लगे दाग को सार्वजनिक तौर पर बड़ी बेशर्मी से धोने में लगी हुई थी.... "ऐसे मामले तो अस्पताल में होते रहते है.." ये बयान डॉक्टर की संवेदन-हीनता को ही नहीं, बौखलाहट को भी बयां करता है. और ये बयान एक खबर के खात्मे के लिए किसी खंज़र से कम नहीं था...महिला डॉक्टर एक माँ होकर भी उस अभागी माँ के दर्द को समझ नहीं पा रही थी...
ज़िन्दगी भर माताओं  के बिच रहकर भी ममता का सबक नहीं समझ सकी. एक डॉक्टर के लिय पहली शर्त ये है की वो एक इंसान हो.इस मामले में ऐसा रंच मात्र भी हो, लगता तो नहीं है...गलती कहीं भी और किसी भी से हो सकती है मगर दंभ में चूर होकर गलती को कबूल न करना और निर्लज्जता पूर्वक बचाव के रास्ते अख्तियार करना, एक सुसंकृत डॉक्टर से तो ऐसी अपेक्षा न तो कोई माँ  करेगी न ही कोई पिता...
कल तक यह मामला मेडिकल नेग्लिजेंस का हो सकता था मगर जनाना अस्पताल की अधीक्षक द्वारा परिजनों को भ्रम में रखना और बेहतर इलाज के मौलिक अधिकार से वंचित रखना...मामले को हलके से लेना ऐसे कुछ कारन है,जिन्हें देखते हुए इस मामले को क्रिमिनल नेग्लिजेंस में तब्दील किये जाना चाहिए ताकि भविष्य में फिर कोई बबली किसी डॉक्टर की लापरवाही के चलते अपनी औलाद न खोये . आखिर किसे है माँ के ज़ख्मो का एहसास..जिगर में गड गए है जिसके हज़ार नश्तर......**यह आलेख दैनिक भास्कर समाचार पत्र में  भी प्रकाशित हो चुका है.**

Saturday, January 02, 2010

दूसरी मौत....

एक संस्मरण........


"उन दिनों घर की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी. पापा को गुज़रे तीन साल से ज्यादा हो गए थे. मम्मी की कुछ मदद हो जाये,इसी चाह में स्कूल से आने के बाद एक मेडिकल स्टोर पर पार्ट टाइम जॉब करने लगा . दिन यु ही गुज़र बसर हो रहे थे.
मेडिकल स्टोर उदयपुर के एक जाने-माने क्षय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के घर के पास था.मेडिकल स्टोर पर हेल्पर की पोस्ट के अलावा  मेरा मुख्य काम था- "रोगियों के शॉप तक लाना." मैं डॉक्टर के घर के बाहर खड़ा रहता और जैसे ही कोई मरीज़ बाहर निकलता, मैं उस से चिपक जाता...मीठी मीठी बातें करते , सहानुभूति जताते मैं उसे शॉप तक ले आता. ..( "लपका" शब्द का प्रयोग तब चलन में नहीं था.)शायद समय  की मुताबिक "व्यवहार प्रवणता" का पाठ वही से सिखने को मिला था.कई मरीजों से तो निजी पहचान हो जाया करती थी और वे ठीक हो जाने के बाद भी मिलने आया करते थे... समय गुज़र  रहा था.
उस दिन भी मैं आम दिनों की तरह डॉक्टर साहब के घर के बाहर उनके नौकर से बतिया रहा था, जो मरीजों को टोकन देता था. मरीजों की तादाद ठीक ठाक थी. कोने में बैठे एक मरीज़ पर बार बार ध्यान जा रहा था. पतला लम्बा चहरा, सर पर ३-४ महीने के बाल, शेविंग बनाये शायद कितना वक़्त बीता होगा, ये उसे भी मालूम नहीं होगा..कपड़ो की स्थिति नोर्मल थी.हालात से साफ़ ज़ाहिर था, स्थिति  दयनीय थी.एक रोगी को शॉप छोड़कर आया तो वही " परिचित" डॉक्टर के घर से  कुछ आगे सड़क किनारे बैठा मिला. साथ में उसकी पत्नी थी, जो भी पति के सामान ही दुबली पतली काया वाली थी.शायद हालातो के कारन उम्र दुगुनी लग रही हो....
मैं आम  रूटीन से उनके पास गया और बातें करने लगा.उसने बताया कि डॉक्टर साहब ने  टी. बी. अस्पताल में भर्ती होने को कहा है. उसे बस स्टैंड तक जाना है...पर बीमारी की वजह से सांस की तकलीफ है. इतनी शक्ति नहीं कि ज्यादा लम्बी दुरी तक चल सके. मेरे पास साइकिल थी. मैंने उसे पीछे बिठाया  और वाया  शॉप ( कुछ दुरी पर स्थित ) बस स्टॉप पर छोड़ने की बात कही. राह में बात करते हुए उसने अपना नाम बसंत बताया.पास ही शिवखेडी  गाँव का रहने वाला. पिछले सालभर से सांस भर आती थी. दम की बीमारी लग रही थी.घर में बेटी का मांडना (विवाह ) था, सो बीमारी के बारे में ज्यादा सोच नहीं पाया,यहाँ तक कि मुह से निकली खून की उलटी तक को ज्यादा तवज्जो नहीं दी. अब हालत ज्यादा ख़राब हुई तो डॉक्टर साब को दिखाया. 
मन द्रवित हो उठा. गरीब लोग किस तरह टाबरी के ब्याह में सब भूल जाते है. ये घातक बीमारियाँ गरीबो को ही क्यों जकड़ती है ???मन सोचने को मजबूर था.. ( तब तक टी.बी. का पूरा इलाज बहुत महंगा होता था और "DOTS" की मुफ्त सेवाएं शुरू नहीं हुई थी..)
बसंतजी ने दवाई खरीदी. ६०० के आस पास बिल था.उनके पास देने को ४०० रुपये ही थे. शॉप वाले भैया उधार दवाई  नहीं देते थे, ये मुझे पता था.  इतने में मैं देखता हु कि बसंतजी की  बीवी अपने गले से सांकली (चांदी का एक पारंपरिक राजस्थानी गहना ) उतारती बोली कि इसे रख ले. भैया कुछ बोलते, इस से पूर्व ही मैं बोल उठा-" नहीं-नहीं काकी, इसकी  ज़रूरत नहीं, बचे रुपये जब हो तब दे जाना...मैं देख लूँगा." भैया मेरा मुह देख रहे थे. 
दोनों की आँखें भर आई. दवाई लेने की बाद वादे के मुताबिक मैं उन्हें बस स्टॉप तक छोड़ने निकलने लगा. भैया गुस्सा हो रहे थे, आखिर मेरा "उनके लिए कीमती" वक़्त जो बर्बाद हो रहा था. तिस पर २०० रुपये और उधार  रख लिए थे, जैसे दुकान मालिक मैं खुद होऊ. 
बस स्टॉप पहुँचते ही मैंने  बसंतजी को साइकिल से निचे उतारा. उन्होंने निचे उतारते ही मेरे पाँव पकड़ लिए. अचानक घटित इस घटना से मैं चौंक पड़ा,आखिर ४०-४५ साल का अधेड़ एक १५ साल के बच्चे के पाँव क्यों पकड़ रहा है....!!! मैं अस्वाभाविक हो उठा. बसंतजी रोये जा रहे थे.वे मेरा एहसान मान रहे थे.मैंने भरे मन से उन्हें उठाया और बस में बिठा दिया. दोनों ने फिर हाथ जोड़ लिए. 
मैं शॉप पर लौट आया. सेवा-दंड के रूप में २०० रुपये तन्खवाह में से काटने का फरमान जारी हो चूका था. मुझे अंदेशा नहीं था. पर फिर भी स्वीकार्यता थी....आत्म-संतुष्ठी का भाव था. घर आकर मम्मी को बताया तो वे भी द्रवित हो उठी. दिन हमारे भी कुछ ठीक नही थे, पर मम्मी ने कुछ भी नहीं कहा.
दिन गुज़रते गए. सभी इस घटना को भूल गए थे. फिर एक  दिन अचानक बसंतजी की  पत्नी शॉप पर आई. नमस्कार के बाद उसने अपने पल्लू में से ४ टुडे-मुड़े ५०-५० के नोट निकाल कर काउंटर पर रख दिए. वो भार उतारने आई थी. भैया की हालत अजीब थी. वे पहले ही मुझसे "भार" वसूल चुके थे. जबकि उस औरत के हालातों में कोई फर्क नज़र नहीं आता था. 
मैंने मना किया पर वो काउंटर पर पैसे रख मुड चली. जाते जाते मैंने उस से बसंतजी की तबियत के बारे में जानना चाहा. वो फिर घूमी और रो पड़ी. आंसुओ  ने जवाब दे दिया था. पता चला कि बसंतजी की मौत उसी दिन हो गयी थी, जिस दिन मैं उन्हें बस स्टॉप छोड़ कर आया था. रोते हुए उसने सिर्फ इतना कहा कि " वे मरते मरते आपकी उधारी चुकाने की कह गए थे. रुपये के  चाराने उधारी उतारने आई थी."
मैं घर आ गया. मन में बार बार पापाजी का चेहरा याद आ रहा था, तो कभी कभी बसंतजी का चेहरा पापा जैसा प्रतीत हो रहा था. पापा का छोड़ा गया ३ लाख का क़र्ज़ मम्मी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ उतारा था.
शाम को मम्मी की गोद में इतने आंसू बहे...... जैसे लगा...पापा इतने दिनों बाद मिलने आये और कुछ पल साथ रहकर फिर चले गए. मम्मी खुद रो रही थी और मुझे सीने से लगाये चुप करने की कोशिश कर रही थी. हम दोनों रो रहे थे, एक ऐसे बसंत के लिए, जो अपरिचित होते हुए भी जाना पहचाना लग रहा था.
इतने दिनों बाद पापा से मिलकर..... बिछुड़ने का गम था....और पापाजी.......हमारे पापाजी की आज ही मौत हुई थी जैसे.....दूसरी मौत........!!!!!!"

Wednesday, December 02, 2009

गुफ्तगू ......

गुफ्तगू ......
पात्र: राज, एक बंदा, उदयपुर से......,
      एकता, एक बंदी, दिल्ली से.....

 ( इन्टरनेट पर chatting करते हुए...)


राज: GM एकता.आज मेरा पुणे में last working day है. कल सुबह हमेशा के लिए उड़ जाऊंगा यहाँ से.bye pune .

एकता: good morning राज. so.. कहाँ जा रहे हो ?

राज: अपने देस.... अपने उदयपुर...
एकता: hmm. वहां तो तुम्हारी गर्ल फ्रेंड्स नहीं होगी न ...कैसे रहोगे उनके बिना तुम....


राज: मेरी मंगेतर है न ...
एकता: ओह ! तो finally  तुम्हे याद आ ही गया कि तुम कमिटेड हो. hmm . और तुम्हारी गर्ल फ्रेंड्स का का होगा ?? बेचारी चूड़ियाँ तोड़ रही होंगी ... ha ha ha ha...


राज: F*** यार. मैं सीरियसली उनके लिए मरने वाला हूँ. मैं चुपके चुपके यहाँ से भाग रहा हूँ.... हा हा हा.
एकता: oh my God. U R player.

राज: नहीं रे ! हम तो क्रिशन जी  कि संतान है, मस्ती मारने के लिए ही पैदा हुए है... 
एकता: क्यों भगवान् को घसीटते हो...


राज: कुमार के होते हुए कैसे मैंने क्रिशन जी को याद कर लिया. कमीनेपन का सबसे बड़ा उदहारण तो जिंदा है. मुझे माफ़करना. and sorry god..pls
एकता: hmm. पर वो तुमसे काफी अच्छा है. player नहीं है वो.... वो बस हवा में मारता है. और तुम.... तुमसे काफी अच्छी सोच है उसकी.....


राज: मेरी मंगेतर के लिए जब मैं कुमार से अच्छा हो सकता हूँ,तो तुम मुझे अच्छा कैसे कह सकती हो? तुम तो सिर्फ उसकी गर्ल फ्रेंड थी...और वो कितना अच्छा है...ये मुझे तुम्हे बताने कि ज़रूरत नहीं है एकता. u knw him very wel...
एकता: पर वो जैसा है, शायद शुरू से ही ऐसा था....और मैंने उसे ऐसे ही स्वीकार किया है... तुम मंगेतर के होते हुए भी वहां पुणे में मुह मारते फिरते हो.



राज: तुम जानती हो कि मैंने अपनी "वेर्जिनिती" अपनी मंगेतर पर ही  ब्रेक कि....और कुमार तो.....अब छोड़ो...
एकता: गुड है... मैं जानती हु...वो अपनी " वेर्जिनिती" 10th में ही ब्रेक कर चूका था...


राज: और एक बात बताऊ एकता ! मैं अभी भी अपनी मंगेटर के प्रति वफादार हु... ये मेरी गर्ल फ्रेंड्स नहीं..सिर्फ friends  है.जैसे कि तुम हो....बस इस से ज्यादा नहीं....

एकता: अच्छा है फिर तो...अगर मैंने तुम्हारे दोस्तों को बता दी ये बात...तो तुम्हारी इज्जत कम हो जाएगी...ha ha ha...


राज: ओ प्लीज, ऐसा नहीं करना.... पर कम से कम कुमार से मुझे कम्पीयर मत करो......मुझे १०० जन्म लगेंगे किसी मकान का 2nd फ्लोर चड़ने में... मैं एक stage performer हु.और  मुझे अपनी औकात पता है.


एकता: hmm. काफी कुछ जानते हो कुमार के बारे में. 


राज: उतना...जितना तुम नहीं जानती... कुमार कभी लडकियों को हर बात नहीं बताता...पर लड़के आपस में हर चीज शेयर करते है. टॉवेल भी...और अपनी girl friends कि बातें भी.....हर बात...

एकता: hmm. तुम्हे ये 2nd फ्लोर वाली बात किसने batayi ?

        

 राज: क्या करने गयी थी तुम वहा एकता...?? सच बताना ...मुझे पता है कि तुम आधी रात तक उस मकान के पास बारिश में खड़ी रही थी....एक पेड़ के निचे.....सच है न...

एकता: F*** man!! ये तो सिर्फ मैं और जिंदल ही जानते है. तुम्हे किसने बताया...?? जिंदल ने...नहीं यार...तुम लड़के लोग girls को आखिर समझते क्या हो??


राज: क्या करने गयी  थी एकता ?? उसको रंगे हाथ पकड़ने न....फिर जब वो तुम्हारे सामने उतर कर जा रहा  था, तो पकड़ा क्यों नहीं?? क्या हो गया था एकता ??

एकता: fuck राज . याद नहीं दिलाओ. मुझ में उसको पकड़ने तक कि हिम्मत नहीं बची थी उस रात....एक लड़की पर इस से ज्यादा क्या बीत सकती है कि उसका बॉय फ्रेंड किसी और के फ्लैट से चोरी छुपे खिड़की से निचे उतर रहा है...और वो बस बारिश में भीग रही है... उस रात सिर्फ आसमान से ही पानी  नहीं गिरा था राज....


राज: senti मत मारो, भूल जाओ उस किस्से को.... तुम हद भोली हो एकता. किसी भी लड़के को ये हक़ किसने दिया कि वो लडकियों से इस तरह खेले....

एकता: ओये राज. ज्यादा मत झाड़. मैं तुझे भी जानती हु... ये अच्छा है कि तू अपनी मंगेतर को लेकर  वफादार है, तो  फिर ...चल ठीक है..हल्का फुल्का टाइम पास तो चाहिए  न...हा हा हा हा 


राज: मैंने कहा न ..मैं एक कलाकार हु, इमोशन कैश करता हु.....
एकता: नेहा के इमोशन भी बखूबी केश किये थे न  तुने ......!!!!
:-)


(शेष अगली किश्त में......)

Monday, November 30, 2009

मुझे माफ़ करना माँ.... !!!


सागर थका हारा रूम पर लौटा। आज अचानक मकान मालिक के दबाव के चलते उसे पुरे ४ घंटे की क्लास अटेंड करनी पड़ी और क्लास के चलते वो मयूर की लंच पार्टी में भी नही जा paya था। ख़ुद से ही खफा हो,ऐसा चेहरा बनाया हुआ......कि.......कोटा में pre-IIT-G की कोचिंग के लिए आये ५-६ माह बीत चुके थे...पर सागर कभी कभी होली-दिवाली ही क्लास अटेंड किया करता था ....
उसे आभास हो चला था कि उसका सलेक्शन नही होने वाला....हो भी तो कैसे.....आज ये पार्टी,कल वो फ़िल्म...बस यह ही ज़िन्दगी थी उसकी ...कोटा में... ।
घर...परिवार..माँ...याद तभी आया करती, जब बैंक खाते में पैसा नही आता था....खैर...खीजते हुए उसने दरवाजा खोला...निचे चिट्ठी पढ़ी थी, शायद माँ की थी..हां माँ की ही थी.......
आखिरी बार जब घर गया था,तो पढ़ाई के सिलसिले में माँ ने खूब "भजन" सुनाये थे...तब से......खैर.....

"प्यारे बिट्टू,
बहुत सारा प्यार !!
कामना है सकुशल होंगे.जब से तुम गए,तुम्हारी याद बहुत परेशां करती रही.अब तक समझ में नही आ रहा कि क्या करू??तुम्हारी चिंता सताती है. जानती hu कि तुम अब बड़े हो गए हो,मुझे तुम्हारी फिक्र नही करनी चाहिए...लेकिन,एक दम से ये भूल नही पाती कि अब तुम्हारी ज़िन्दगी में मेरे अलावा भी बहुत कुछ और है...मन अजीब सी छात्पताहत से भर उठता है.बैचेनी दिल को कसकर मुट्ठी में भींच लेती है.लेकिन होंठ भीड़ में फ़िर मुस्कुराने लगते है.मन ishwar से यही प्रार्थना करता है कि तुम हमेशा खुश रहो..तुम्हारे सपने पूरे हो।
अबकी बार जा तुम आए,तुमसे ढेर साडी बातें करना चाहती थी मैं,लेकिन हमारे तुम्हारे बिच ढेर सारी कदवहतो ने जन्मा ले लिया। तुम कुछ सुनाने को तैयार नही थे और मेरा शायद कहने का तरीका ही ग़लत था.ग़लत मैं कई जगह पर हु। मेरी सोच ग़लत है,मेरी अपेक्षाएं ग़लत है, मेरी चाहत ग़लत है- सब कुछ तो ग़लत है फ़िर सही कुछ हो भी तो कैसे !!!!
मैं बचपन में सोचा करती थी कि आदमी का भाग्य कुछ नही होता..आदमी चाहे तो अपनी म्हणत से अपने हाथ कि लकीरों को बदल सकता है.लेकिन मैं कुछ भी नही बदल सकी। ना अपनी किस्मत और न ही इन हाथ कि लकीरों में कैद अपना भविष्य और वर्तमान। तुमसे कुछ भी तो नही छिपा है। सब कुछ खुली किताब कि तरह तुम्हारे सामने है॥ बुजुर्गो कि मौत के बाद सोचा चलो तुम्हारे पापा तो है। पर जब तुम ७ साल के थे तो तुम्हारे पापा, मुझे और तुम्हे भगवन के भरोसे छोड़ किसी और के साथ....... मैंने सोचा, तुम तो हो। तुम मेरा अपना खून हो,तुमसे काफी अपेक्षाएं थी मुझे...और हैं...
खैर,सबसे पहले मैं तुमसे अपने उस दिन के व्यवहार के लिए माफ़ी चाहती हु। मुझे तुम पर हाथ नही उठाना चाहिए था। माँ-बच्चे का रिश्ता शायद बदती उमर के साथ बदल जाना चाहिए....पर माँ के लिए तो ३ साल के बिट्टू और १८ साल के सागर में कोई अन्तर नही होता न... ।शायद अब मेरा तुम पर हक ख़तम सा हो चला है, विश्वास है तुम मुझे माफ़ करोगे । हाँ ! इत अवश्य चाहती हु कि हमारे बिच स्नेह बना रहे ।
बिट्टू, मैंने जीवन में बहुत संगर्ष किया है। पुरी ज़िन्दगी मैंने दुसरो की उपेक्षा और तिरस्कार सहे है। सभी ने मेरे लिए कठिनाईयां ही पैदा की .ना jane मेरे bhitar ऐसा क्या था कि , जिसने मेरी संघर्ष क्षमता को जीवीत रखा। क्योकि मैं कायर नही थी, इसलिए मर ना सकी । और फ़िर तुम्हे किसके भरोसे छोडती ? लेकिन आज ज़िन्दगी से थकान लगने लगी है। कोई आकर्षण नही रह गया है। साँस साँस बोझिल लगने लगी है।
हाँ...तो मैं कह रही थी कि नि:संदेह तुम्हारी ज़िन्दगी में मेरी कोई जगह न हो, लेकिन इतना अवश्य चाहती हु कि तुम अपने raste से न bhatko। मेहनत करना sikho और manzil pa लो। वरना तुम ज़िन्दगी में बहुत piche रह जाओगे। यदि समय का mulya नही पहचानोगे तो कल समय तुम्हारा मूल्य gavan देगा।
मेरी बात को तुम ये न समझना कि माँ ने कहा है। ये मेरी ज़िन्दगी का तजुर्बा है। मेरा क्या है...मुझे तो अब कुछ पाना भी नही... । तुम ख़ुद समझदार हो।
तुम्हारा बचपन अच्छा गुज़रा। पहले माँ-पापा का और फ़िर सिर्फ़ माँ का ही सही, पर तुम्हे ढेर सारा स्नेह मिला। माँ ने तुम्हारे पीछे अपने सारे दुखो को भुला दिया। अक्सर छोटे में वो तुम्हे खिलाती थी तो गाया करती थी॥
"आ अंगुली पकड़ कर तेरी, मैं तुझको चला सिखाऊ
फ़िर हाथ पकड़ना मेरा, जब बूढी हो जाऊ।"

तुम्हारी एक अजीब सी चिंता मुझे हर पल घेरे रहती है. पता नही मेरे भाग्य में और क्या लिखा है ? तुम्हारे भविष्य कि चिंता मुझे हर दम परेशान करती है, लेकिन मैं सिर्फ़ चटपटा ही पाती हु। जीवन में कभी भी, कही भी, किसी भी viprit परिस्थिति में हमेशा झूझने वाली मैं...यहीं आकर टूट जाती हु। अब तो सब कुछ इश्वर के हाथ छोड़ दिया है। शायद इसके अलवा मेरे पास कोई चारा भी नही रहा।
इतनी साड़ी नसीहतें पढ़ कर तुम्हे ज़रूर गुस्सा आएगा,लेकन ये तुम्हारी माँ नही लिख रही...भरती शर्मा लिख रही है। मेरे और तुम्हारे बिच का रिश्ता अगर सहज न रह पाए, तो मुझे तुम्हारी माँ कहलवाने का कोई हक नही ... । फ़िर भी मैं तुम्हारे हल पल, हर क्षण साथ हूँ। तुम्हारे अच्छे में भी और तुम्हारे बुरे मैं भी।
मेरे रहते तुम्हे कभी अभाव या परेशानी नही देखनी पड़ेगी। ये एक वादा है मेरा। तुम हमेशा मुझे अपने आस-पास पाओगे। हमेशा खुश रहो । मैं चाहती हु कि मैं अपना आत्मा सम्मान बनाये रख पौ, तुम मुझे tna जीवन jine layak doge।
मेरी shubh kamnayein,प्यार dular, आशीर्वाद सभी पर आख़िर तुम्हारा ही तो हक है...

भरती शर्मा।"


sanghya shunya हो सागर उस चिट्ठी को देखे जा रहा था, जो ख़तम हो कर भी शायद shesh थी...शब्दों के ज्वर बार bar उसके मन को उद्वेलित कर रहे थे। तभी बहार दरवाजे पर दस्तक हुई, bahar कुछ दोस्त खड़े थे...."सागर ॐ सिनेप्लेक्स में नई फ़िल्म लगी है.......रिश्ते........चलेगा देखने....."
सागर कुछ देर सोचने लगा । फ़िर घड़ी ki और देखा...६ bajne में aadha घंटा था। बस वो जल्दी जल्दी कपड़े badlne लगा....
darvaje पर ताला lagate हुए budbudaya..."मुझे माफ़ करना माँ॥!!!!"
चिट्ठी का jvaar ठंडा पड़ चुका था....वो फ़िल्म देखने जा रहा था....रिश्ते....."