Friday, January 22, 2010

हद की भी हद हो गयी......

मेरा उदयपुर अपनी खूबसूरती.... अपनी मेहमान नवाजी के लिए पूरे  विश्व में जाना जाता है....पर पिछले कुछ समय से जैसे मेरे शहर की अस्मिता को ही कोई ग्रहण लग गया लगता है.... कोई तीन साल पहले उदयपुर की मुख्य झील फ़तेहसागर  में तीन कन्या भ्रूण  मिले थे... तो अब एक डॉक्टर की लापरवाही से एक नवजात की साँसे "कट" गयी....और उसके बाद वो डॉक्टर..जो खुद उस जनाना अस्पताल की अधीक्षक भी है...खुद एक माँ भी है....कहती है....ऐसी घटनाएं तो होती रहती है...
उदयपुर के सरकारी पन्नाधाय जनाना अस्पताल में एक सिजेरियन के दौरान डॉक्टर की लापरवाही से ब्लेड से नवजात का एक हाथ  कट गया.हाथ काटने के तीसरे दिन नवजात की मौत हो गयी. अस्पताल की अधीक्षक डॉक्टर  कमलेश पंजाबी की यूनिट में हुई इस लापरवाही के बाद उनका गैर जिम्मेदाराना कमेन्ट यहाँ चर्चा का विषय बना हुआ है. कलेक्टर आनंद कुमार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल जांच के आदेश दे दिए है.इस लापरवाही पर वरिष्ठ डॉक्टरों से कोई जवाब देते नहीं बन रहा है...डॉक्टरों की साँसे फूली हुई है..सभी बड़े डॉक्टर्स  ने अपने मोबाईल फोन बंद कर दिए है..."

ये एक शर्मनाक लापरवाही है.....

हद की भी हद हो गयी. बबली (मां)   के जिगर के टुकड़े हो गए और डॉक्टर ने अपने हाथ "दास्ताने" में छुपाने के लिए जी-जान लगा दी. संवेदनाओं की बलि होने की वेदना को हर इंसान ने झेला और....शिशु हाथ ही नहीं जान से भी चला ग्गाया. आखिर कहाँ गिरेंगे ये आंसू मिस्कीनी के...इधर खून जिगर का...उधर सितमगर.." एक डॉक्टर की बेशर्मी की वजह से बबली माँ बनकर भी मातृत्व का सुख नहीं पा सकी, एक ज़िंदा लाश बन गयी है .
एक माँ की कोख उजड़ने की कगार पर थी,मगर महिला डॉक्टर अपनी टीम पर लगे दाग को सार्वजनिक तौर पर बड़ी बेशर्मी से धोने में लगी हुई थी.... "ऐसे मामले तो अस्पताल में होते रहते है.." ये बयान डॉक्टर की संवेदन-हीनता को ही नहीं, बौखलाहट को भी बयां करता है. और ये बयान एक खबर के खात्मे के लिए किसी खंज़र से कम नहीं था...महिला डॉक्टर एक माँ होकर भी उस अभागी माँ के दर्द को समझ नहीं पा रही थी...
ज़िन्दगी भर माताओं  के बिच रहकर भी ममता का सबक नहीं समझ सकी. एक डॉक्टर के लिय पहली शर्त ये है की वो एक इंसान हो.इस मामले में ऐसा रंच मात्र भी हो, लगता तो नहीं है...गलती कहीं भी और किसी भी से हो सकती है मगर दंभ में चूर होकर गलती को कबूल न करना और निर्लज्जता पूर्वक बचाव के रास्ते अख्तियार करना, एक सुसंकृत डॉक्टर से तो ऐसी अपेक्षा न तो कोई माँ  करेगी न ही कोई पिता...
कल तक यह मामला मेडिकल नेग्लिजेंस का हो सकता था मगर जनाना अस्पताल की अधीक्षक द्वारा परिजनों को भ्रम में रखना और बेहतर इलाज के मौलिक अधिकार से वंचित रखना...मामले को हलके से लेना ऐसे कुछ कारन है,जिन्हें देखते हुए इस मामले को क्रिमिनल नेग्लिजेंस में तब्दील किये जाना चाहिए ताकि भविष्य में फिर कोई बबली किसी डॉक्टर की लापरवाही के चलते अपनी औलाद न खोये . आखिर किसे है माँ के ज़ख्मो का एहसास..जिगर में गड गए है जिसके हज़ार नश्तर......**यह आलेख दैनिक भास्कर समाचार पत्र में  भी प्रकाशित हो चुका है.**

Saturday, January 02, 2010

दूसरी मौत....

एक संस्मरण........


"उन दिनों घर की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी. पापा को गुज़रे तीन साल से ज्यादा हो गए थे. मम्मी की कुछ मदद हो जाये,इसी चाह में स्कूल से आने के बाद एक मेडिकल स्टोर पर पार्ट टाइम जॉब करने लगा . दिन यु ही गुज़र बसर हो रहे थे.
मेडिकल स्टोर उदयपुर के एक जाने-माने क्षय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के घर के पास था.मेडिकल स्टोर पर हेल्पर की पोस्ट के अलावा  मेरा मुख्य काम था- "रोगियों के शॉप तक लाना." मैं डॉक्टर के घर के बाहर खड़ा रहता और जैसे ही कोई मरीज़ बाहर निकलता, मैं उस से चिपक जाता...मीठी मीठी बातें करते , सहानुभूति जताते मैं उसे शॉप तक ले आता. ..( "लपका" शब्द का प्रयोग तब चलन में नहीं था.)शायद समय  की मुताबिक "व्यवहार प्रवणता" का पाठ वही से सिखने को मिला था.कई मरीजों से तो निजी पहचान हो जाया करती थी और वे ठीक हो जाने के बाद भी मिलने आया करते थे... समय गुज़र  रहा था.
उस दिन भी मैं आम दिनों की तरह डॉक्टर साहब के घर के बाहर उनके नौकर से बतिया रहा था, जो मरीजों को टोकन देता था. मरीजों की तादाद ठीक ठाक थी. कोने में बैठे एक मरीज़ पर बार बार ध्यान जा रहा था. पतला लम्बा चहरा, सर पर ३-४ महीने के बाल, शेविंग बनाये शायद कितना वक़्त बीता होगा, ये उसे भी मालूम नहीं होगा..कपड़ो की स्थिति नोर्मल थी.हालात से साफ़ ज़ाहिर था, स्थिति  दयनीय थी.एक रोगी को शॉप छोड़कर आया तो वही " परिचित" डॉक्टर के घर से  कुछ आगे सड़क किनारे बैठा मिला. साथ में उसकी पत्नी थी, जो भी पति के सामान ही दुबली पतली काया वाली थी.शायद हालातो के कारन उम्र दुगुनी लग रही हो....
मैं आम  रूटीन से उनके पास गया और बातें करने लगा.उसने बताया कि डॉक्टर साहब ने  टी. बी. अस्पताल में भर्ती होने को कहा है. उसे बस स्टैंड तक जाना है...पर बीमारी की वजह से सांस की तकलीफ है. इतनी शक्ति नहीं कि ज्यादा लम्बी दुरी तक चल सके. मेरे पास साइकिल थी. मैंने उसे पीछे बिठाया  और वाया  शॉप ( कुछ दुरी पर स्थित ) बस स्टॉप पर छोड़ने की बात कही. राह में बात करते हुए उसने अपना नाम बसंत बताया.पास ही शिवखेडी  गाँव का रहने वाला. पिछले सालभर से सांस भर आती थी. दम की बीमारी लग रही थी.घर में बेटी का मांडना (विवाह ) था, सो बीमारी के बारे में ज्यादा सोच नहीं पाया,यहाँ तक कि मुह से निकली खून की उलटी तक को ज्यादा तवज्जो नहीं दी. अब हालत ज्यादा ख़राब हुई तो डॉक्टर साब को दिखाया. 
मन द्रवित हो उठा. गरीब लोग किस तरह टाबरी के ब्याह में सब भूल जाते है. ये घातक बीमारियाँ गरीबो को ही क्यों जकड़ती है ???मन सोचने को मजबूर था.. ( तब तक टी.बी. का पूरा इलाज बहुत महंगा होता था और "DOTS" की मुफ्त सेवाएं शुरू नहीं हुई थी..)
बसंतजी ने दवाई खरीदी. ६०० के आस पास बिल था.उनके पास देने को ४०० रुपये ही थे. शॉप वाले भैया उधार दवाई  नहीं देते थे, ये मुझे पता था.  इतने में मैं देखता हु कि बसंतजी की  बीवी अपने गले से सांकली (चांदी का एक पारंपरिक राजस्थानी गहना ) उतारती बोली कि इसे रख ले. भैया कुछ बोलते, इस से पूर्व ही मैं बोल उठा-" नहीं-नहीं काकी, इसकी  ज़रूरत नहीं, बचे रुपये जब हो तब दे जाना...मैं देख लूँगा." भैया मेरा मुह देख रहे थे. 
दोनों की आँखें भर आई. दवाई लेने की बाद वादे के मुताबिक मैं उन्हें बस स्टॉप तक छोड़ने निकलने लगा. भैया गुस्सा हो रहे थे, आखिर मेरा "उनके लिए कीमती" वक़्त जो बर्बाद हो रहा था. तिस पर २०० रुपये और उधार  रख लिए थे, जैसे दुकान मालिक मैं खुद होऊ. 
बस स्टॉप पहुँचते ही मैंने  बसंतजी को साइकिल से निचे उतारा. उन्होंने निचे उतारते ही मेरे पाँव पकड़ लिए. अचानक घटित इस घटना से मैं चौंक पड़ा,आखिर ४०-४५ साल का अधेड़ एक १५ साल के बच्चे के पाँव क्यों पकड़ रहा है....!!! मैं अस्वाभाविक हो उठा. बसंतजी रोये जा रहे थे.वे मेरा एहसान मान रहे थे.मैंने भरे मन से उन्हें उठाया और बस में बिठा दिया. दोनों ने फिर हाथ जोड़ लिए. 
मैं शॉप पर लौट आया. सेवा-दंड के रूप में २०० रुपये तन्खवाह में से काटने का फरमान जारी हो चूका था. मुझे अंदेशा नहीं था. पर फिर भी स्वीकार्यता थी....आत्म-संतुष्ठी का भाव था. घर आकर मम्मी को बताया तो वे भी द्रवित हो उठी. दिन हमारे भी कुछ ठीक नही थे, पर मम्मी ने कुछ भी नहीं कहा.
दिन गुज़रते गए. सभी इस घटना को भूल गए थे. फिर एक  दिन अचानक बसंतजी की  पत्नी शॉप पर आई. नमस्कार के बाद उसने अपने पल्लू में से ४ टुडे-मुड़े ५०-५० के नोट निकाल कर काउंटर पर रख दिए. वो भार उतारने आई थी. भैया की हालत अजीब थी. वे पहले ही मुझसे "भार" वसूल चुके थे. जबकि उस औरत के हालातों में कोई फर्क नज़र नहीं आता था. 
मैंने मना किया पर वो काउंटर पर पैसे रख मुड चली. जाते जाते मैंने उस से बसंतजी की तबियत के बारे में जानना चाहा. वो फिर घूमी और रो पड़ी. आंसुओ  ने जवाब दे दिया था. पता चला कि बसंतजी की मौत उसी दिन हो गयी थी, जिस दिन मैं उन्हें बस स्टॉप छोड़ कर आया था. रोते हुए उसने सिर्फ इतना कहा कि " वे मरते मरते आपकी उधारी चुकाने की कह गए थे. रुपये के  चाराने उधारी उतारने आई थी."
मैं घर आ गया. मन में बार बार पापाजी का चेहरा याद आ रहा था, तो कभी कभी बसंतजी का चेहरा पापा जैसा प्रतीत हो रहा था. पापा का छोड़ा गया ३ लाख का क़र्ज़ मम्मी ने बड़े आत्मविश्वास के साथ उतारा था.
शाम को मम्मी की गोद में इतने आंसू बहे...... जैसे लगा...पापा इतने दिनों बाद मिलने आये और कुछ पल साथ रहकर फिर चले गए. मम्मी खुद रो रही थी और मुझे सीने से लगाये चुप करने की कोशिश कर रही थी. हम दोनों रो रहे थे, एक ऐसे बसंत के लिए, जो अपरिचित होते हुए भी जाना पहचाना लग रहा था.
इतने दिनों बाद पापा से मिलकर..... बिछुड़ने का गम था....और पापाजी.......हमारे पापाजी की आज ही मौत हुई थी जैसे.....दूसरी मौत........!!!!!!"

Wednesday, December 02, 2009

गुफ्तगू ......

गुफ्तगू ......
पात्र: राज, एक बंदा, उदयपुर से......,
      एकता, एक बंदी, दिल्ली से.....

 ( इन्टरनेट पर chatting करते हुए...)


राज: GM एकता.आज मेरा पुणे में last working day है. कल सुबह हमेशा के लिए उड़ जाऊंगा यहाँ से.bye pune .

एकता: good morning राज. so.. कहाँ जा रहे हो ?

राज: अपने देस.... अपने उदयपुर...
एकता: hmm. वहां तो तुम्हारी गर्ल फ्रेंड्स नहीं होगी न ...कैसे रहोगे उनके बिना तुम....


राज: मेरी मंगेतर है न ...
एकता: ओह ! तो finally  तुम्हे याद आ ही गया कि तुम कमिटेड हो. hmm . और तुम्हारी गर्ल फ्रेंड्स का का होगा ?? बेचारी चूड़ियाँ तोड़ रही होंगी ... ha ha ha ha...


राज: F*** यार. मैं सीरियसली उनके लिए मरने वाला हूँ. मैं चुपके चुपके यहाँ से भाग रहा हूँ.... हा हा हा.
एकता: oh my God. U R player.

राज: नहीं रे ! हम तो क्रिशन जी  कि संतान है, मस्ती मारने के लिए ही पैदा हुए है... 
एकता: क्यों भगवान् को घसीटते हो...


राज: कुमार के होते हुए कैसे मैंने क्रिशन जी को याद कर लिया. कमीनेपन का सबसे बड़ा उदहारण तो जिंदा है. मुझे माफ़करना. and sorry god..pls
एकता: hmm. पर वो तुमसे काफी अच्छा है. player नहीं है वो.... वो बस हवा में मारता है. और तुम.... तुमसे काफी अच्छी सोच है उसकी.....


राज: मेरी मंगेतर के लिए जब मैं कुमार से अच्छा हो सकता हूँ,तो तुम मुझे अच्छा कैसे कह सकती हो? तुम तो सिर्फ उसकी गर्ल फ्रेंड थी...और वो कितना अच्छा है...ये मुझे तुम्हे बताने कि ज़रूरत नहीं है एकता. u knw him very wel...
एकता: पर वो जैसा है, शायद शुरू से ही ऐसा था....और मैंने उसे ऐसे ही स्वीकार किया है... तुम मंगेतर के होते हुए भी वहां पुणे में मुह मारते फिरते हो.



राज: तुम जानती हो कि मैंने अपनी "वेर्जिनिती" अपनी मंगेतर पर ही  ब्रेक कि....और कुमार तो.....अब छोड़ो...
एकता: गुड है... मैं जानती हु...वो अपनी " वेर्जिनिती" 10th में ही ब्रेक कर चूका था...


राज: और एक बात बताऊ एकता ! मैं अभी भी अपनी मंगेटर के प्रति वफादार हु... ये मेरी गर्ल फ्रेंड्स नहीं..सिर्फ friends  है.जैसे कि तुम हो....बस इस से ज्यादा नहीं....

एकता: अच्छा है फिर तो...अगर मैंने तुम्हारे दोस्तों को बता दी ये बात...तो तुम्हारी इज्जत कम हो जाएगी...ha ha ha...


राज: ओ प्लीज, ऐसा नहीं करना.... पर कम से कम कुमार से मुझे कम्पीयर मत करो......मुझे १०० जन्म लगेंगे किसी मकान का 2nd फ्लोर चड़ने में... मैं एक stage performer हु.और  मुझे अपनी औकात पता है.


एकता: hmm. काफी कुछ जानते हो कुमार के बारे में. 


राज: उतना...जितना तुम नहीं जानती... कुमार कभी लडकियों को हर बात नहीं बताता...पर लड़के आपस में हर चीज शेयर करते है. टॉवेल भी...और अपनी girl friends कि बातें भी.....हर बात...

एकता: hmm. तुम्हे ये 2nd फ्लोर वाली बात किसने batayi ?

        

 राज: क्या करने गयी थी तुम वहा एकता...?? सच बताना ...मुझे पता है कि तुम आधी रात तक उस मकान के पास बारिश में खड़ी रही थी....एक पेड़ के निचे.....सच है न...

एकता: F*** man!! ये तो सिर्फ मैं और जिंदल ही जानते है. तुम्हे किसने बताया...?? जिंदल ने...नहीं यार...तुम लड़के लोग girls को आखिर समझते क्या हो??


राज: क्या करने गयी  थी एकता ?? उसको रंगे हाथ पकड़ने न....फिर जब वो तुम्हारे सामने उतर कर जा रहा  था, तो पकड़ा क्यों नहीं?? क्या हो गया था एकता ??

एकता: fuck राज . याद नहीं दिलाओ. मुझ में उसको पकड़ने तक कि हिम्मत नहीं बची थी उस रात....एक लड़की पर इस से ज्यादा क्या बीत सकती है कि उसका बॉय फ्रेंड किसी और के फ्लैट से चोरी छुपे खिड़की से निचे उतर रहा है...और वो बस बारिश में भीग रही है... उस रात सिर्फ आसमान से ही पानी  नहीं गिरा था राज....


राज: senti मत मारो, भूल जाओ उस किस्से को.... तुम हद भोली हो एकता. किसी भी लड़के को ये हक़ किसने दिया कि वो लडकियों से इस तरह खेले....

एकता: ओये राज. ज्यादा मत झाड़. मैं तुझे भी जानती हु... ये अच्छा है कि तू अपनी मंगेतर को लेकर  वफादार है, तो  फिर ...चल ठीक है..हल्का फुल्का टाइम पास तो चाहिए  न...हा हा हा हा 


राज: मैंने कहा न ..मैं एक कलाकार हु, इमोशन कैश करता हु.....
एकता: नेहा के इमोशन भी बखूबी केश किये थे न  तुने ......!!!!
:-)


(शेष अगली किश्त में......)

Monday, November 30, 2009

मुझे माफ़ करना माँ.... !!!


सागर थका हारा रूम पर लौटाआज अचानक मकान मालिक के दबाव के चलते उसे पुरे घंटे की क्लास अटेंड करनी पड़ी और क्लास के चलते वो मयूर की लंच पार्टी में भी नही जा paya थाख़ुद से ही खफा हो,ऐसा चेहरा बनाया हुआ......कि.......कोटा में pre-IIT-G की कोचिंग के लिए आये - माह बीत चुके थे...पर सागर कभी कभी होली-दिवाली ही क्लास अटेंड किया करता था ....
उसे आभास हो चला था कि उसका सलेक्शन नही होने वाला....हो भी तो कैसे.....आज ये पार्टी,कल वो फ़िल्म...बस यह ही ज़िन्दगी थी उसकी ...कोटा में... ।
घर...परिवार..माँ...याद तभी आया करती, जब बैंक खाते में पैसा नही आता था....खैर...खीजते हुए उसने दरवाजा खोला...निचे चिट्ठी पढ़ी थी, शायद माँ की थी..हां माँ की ही थी.......
आखिरी बार जब घर गया था,तो पढ़ाई के सिलसिले में माँ ने खूब "भजन" सुनाये थे...तब से......खैर.....

"प्यारे बिट्टू,
बहुत सारा प्यार !!
कामना है सकुशल होंगे.जब से तुम गए,तुम्हारी याद बहुत परेशां करती रही.अब तक समझ में नही रहा कि क्या करू??तुम्हारी चिंता सताती है. जानती hu कि तुम अब बड़े हो गए हो,मुझे तुम्हारी फिक्र नही करनी चाहिए...लेकिन,एक दम से ये भूल नही पाती कि अब तुम्हारी ज़िन्दगी में मेरे अलावा भी बहुत कुछ और है...मन अजीब सी छात्पताहत से भर उठता है.बैचेनी दिल को कसकर मुट्ठी में भींच लेती है.लेकिन होंठ भीड़ में फ़िर मुस्कुराने लगते है.मन ishwar से यही प्रार्थना करता है कि तुम हमेशा खुश रहो..तुम्हारे सपने पूरे हो
अबकी बार जा तुम आए,तुमसे ढेर साडी बातें करना चाहती थी मैं,लेकिन हमारे तुम्हारे बिच ढेर सारी कदवहतो ने जन्मा ले लियातुम कुछ सुनाने को तैयार नही थे और मेरा शायद कहने का तरीका ही ग़लत था.ग़लत मैं कई जगह पर हुमेरी सोच ग़लत है,मेरी अपेक्षाएं ग़लत है, मेरी चाहत ग़लत है- सब कुछ तो ग़लत है फ़िर सही कुछ हो भी तो कैसे !!!!
मैं बचपन में सोचा करती थी कि आदमी का भाग्य कुछ नही होता..आदमी चाहे तो अपनी म्हणत से अपने हाथ कि लकीरों को बदल सकता है.लेकिन मैं कुछ भी नही बदल सकीना अपनी किस्मत और ही इन हाथ कि लकीरों में कैद अपना भविष्य और वर्तमानतुमसे कुछ भी तो नही छिपा हैसब कुछ खुली किताब कि तरह तुम्हारे सामने हैबुजुर्गो कि मौत के बाद सोचा चलो तुम्हारे पापा तो हैपर जब तुम साल के थे तो तुम्हारे पापा, मुझे और तुम्हे भगवन के भरोसे छोड़ किसी और के साथ....... मैंने सोचा, तुम तो होतुम मेरा अपना खून हो,तुमसे काफी अपेक्षाएं थी मुझे...और हैं...
खैर,सबसे पहले मैं तुमसे अपने उस दिन के व्यवहार के लिए माफ़ी चाहती हुमुझे तुम पर हाथ नही उठाना चाहिए थामाँ-बच्चे का रिश्ता शायद बदती उमर के साथ बदल जाना चाहिए....पर माँ के लिए तो साल के बिट्टू और १८ साल के सागर में कोई अन्तर नही होता ... ।शायद अब मेरा तुम पर हक ख़तम सा हो चला है, विश्वास है तुम मुझे माफ़ करोगेहाँ ! इत अवश्य चाहती हु कि हमारे बिच स्नेह बना रहे
बिट्टू, मैंने जीवन में बहुत संगर्ष किया हैपुरी ज़िन्दगी मैंने दुसरो की उपेक्षा और तिरस्कार सहे हैसभी ने मेरे लिए कठिनाईयां ही पैदा की .ना jane मेरे bhitar ऐसा क्या था कि , जिसने मेरी संघर्ष क्षमता को जीवीत रखाक्योकि मैं कायर नही थी, इसलिए मर ना सकीऔर फ़िर तुम्हे किसके भरोसे छोडती ? लेकिन आज ज़िन्दगी से थकान लगने लगी हैकोई आकर्षण नही रह गया हैसाँस साँस बोझिल लगने लगी है
हाँ...तो मैं कह रही थी कि नि:संदेह तुम्हारी ज़िन्दगी में मेरी कोई जगह हो, लेकिन इतना अवश्य चाहती हु कि तुम अपने raste से bhatkoमेहनत करना sikho और manzil pa लोवरना तुम ज़िन्दगी में बहुत piche रह जाओगेयदि समय का mulya नही पहचानोगे तो कल समय तुम्हारा मूल्य gavan देगा
मेरी बात को तुम ये समझना कि माँ ने कहा हैये मेरी ज़िन्दगी का तजुर्बा हैमेरा क्या है...मुझे तो अब कुछ पाना भी नही... । तुम ख़ुद समझदार हो
तुम्हारा बचपन अच्छा गुज़रापहले माँ-पापा का और फ़िर सिर्फ़ माँ का ही सही, पर तुम्हे ढेर सारा स्नेह मिलामाँ ने तुम्हारे पीछे अपने सारे दुखो को भुला दियाअक्सर छोटे में वो तुम्हे खिलाती थी तो गाया करती थी
" अंगुली पकड़ कर तेरी, मैं तुझको चला सिखाऊ
फ़िर हाथ पकड़ना मेरा, जब बूढी हो जाऊ।"

तुम्हारी एक अजीब सी चिंता मुझे हर पल घेरे रहती है. पता नही मेरे भाग्य में और क्या लिखा है ? तुम्हारे भविष्य कि चिंता मुझे हर दम परेशान करती है, लेकिन मैं सिर्फ़ चटपटा ही पाती हुजीवन में कभी भी, कही भी, किसी भी viprit परिस्थिति में हमेशा झूझने वाली मैं...यहीं आकर टूट जाती हुअब तो सब कुछ इश्वर के हाथ छोड़ दिया हैशायद इसके अलवा मेरे पास कोई चारा भी नही रहा
इतनी साड़ी नसीहतें पढ़ कर तुम्हे ज़रूर गुस्सा आएगा,लेकन ये तुम्हारी माँ नही लिख रही...भरती शर्मा लिख रही हैमेरे और तुम्हारे बिच का रिश्ता अगर सहज रह पाए, तो मुझे तुम्हारी माँ कहलवाने का कोई हक नही ... । फ़िर भी मैं तुम्हारे हल पल, हर क्षण साथ हूँतुम्हारे अच्छे में भी और तुम्हारे बुरे मैं भी
मेरे रहते तुम्हे कभी अभाव या परेशानी नही देखनी पड़ेगीये एक वादा है मेरातुम हमेशा मुझे अपने आस-पास पाओगेहमेशा खुश रहोमैं चाहती हु कि मैं अपना आत्मा सम्मान बनाये रख पौ, तुम मुझे tna जीवन jine layak doge
मेरी shubh kamnayein,प्यार dular, आशीर्वाद सभी पर आख़िर तुम्हारा ही तो हक है...

भरती शर्मा।"


sanghya shunya हो सागर उस चिट्ठी को देखे जा रहा था, जो ख़तम हो कर भी शायद shesh थी...शब्दों के ज्वर बार bar उसके मन को उद्वेलित कर रहे थेतभी बहार दरवाजे पर दस्तक हुई, bahar कुछ दोस्त खड़े थे...."सागर सिनेप्लेक्स में नई फ़िल्म लगी है.......रिश्ते........चलेगा देखने....."
सागर कुछ देर सोचने लगाफ़िर घड़ी ki और देखा... bajne में aadha घंटा थाबस वो जल्दी जल्दी कपड़े badlne लगा....
darvaje पर ताला lagate हुए budbudaya..."मुझे माफ़ करना माँ॥!!!!"
चिट्ठी का jvaar ठंडा पड़ चुका था....वो फ़िल्म देखने जा रहा था....रिश्ते....."